सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला भाग कर शादी करना है तो बेटी का बाप की जयदाद पर कोई हक नहीं।

18 वर्ष की होकर भी भाग कर शादी करेंगे तो पछताना पड़ेगा।
आज भी कई परिवारों और समुदायों में एक अलिखित नियम चलता है . पिता की मर्ज़ी सबसे ऊपर। खासकर तब, जब कोई बेटी अपने ही समाज या बिरादरी से बाहर विवाह कर ले। ऐसे मामलों में अक्सर उसे परिवार की जायदाद से अलग कर दिया जाता है, मानो उसने सिर्फ़ शादी नहीं, बल्कि अपने हक़ का दावा भी छोड़ दिया हो।
कानून ने लिया फैसला ज्यादा तुम्हें कोई हक नहीं लड़की भाग कर शादी कर तो
यह सोच क़ानून से ज़्यादा परंपरा पर टिकी होती है। पिता को परिवार की संपत्ति का सर्वेसर्वा मान लिया जाता है और बेटी के फैसले को घर की मर्यादा के खिलाफ़ देखा जाता है। नतीजा यह होता है कि बेटी, जो बचपन से उसी घर में पली . बढ़ी, अचानक पराया समझ ली जाती है।
अब नहीं चलेगी 18 वर्ष के लड़कियों या लड़की की मनमानी
दिलचस्प बात यह है कि यह फैसला अक्सर भावनाओं, सामाजिक दबाव और इज़्ज़त के डर से लिया जाता है, न कि किसी लिखित नियम से। बेटी की पढ़ाई, पालन-पोषण और उसके अधिकार—सब कुछ एक विवाह के निर्णय से तौल दिया जाता है।
समाज बदल रहा है, कानून बेटियों को बराबरी का हक़ देता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत अब भी कई जगह पुरानी सोच से बंधी है। सवाल यह नहीं कि पिता की मर्ज़ी क्या है, सवाल यह है कि क्या बेटी की ज़िंदगी और उसके अधिकारों की भी उतनी ही क़ीमत है
