शिमला के पास बागी पंचायत में जठिया देवी टाउनशिप का विरोध, ग्राम सभा ने भूमि अधिग्रहण पर उठाए सवाल

शिमला से सटे बागी पंचायत में जठिया देवी टाउनशिप का विरोध, ग्राम सभा ने भूमि अधिग्रहण पर जताई आपत्ति
हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से सटे बागी पंचायत क्षेत्र में प्रस्तावित जठिया देवी टाउनशिप परियोजना को लेकर ग्रामीणों में गहरा विरोध देखने को मिल रहा है। इस मुद्दे पर हाल ही में आयोजित ग्राम सभा में स्थानीय लोगों ने एकजुट होकर भूमि अधिग्रहण और टाउनशिप निर्माण के खिलाफ अपनी नाराज़गी जाहिर की।
ग्रामीणों का कहना है कि यह क्षेत्र कृषि, बागवानी और प्राकृतिक संसाधनों के लिए जाना जाता है। यहां की जमीन पर सेब के बागान, जल स्रोत और जंगल मौजूद हैं, जो ग्रामीणों की आजीविका का मुख्य आधार हैं। ऐसे में बड़े पैमाने पर टाउनशिप विकसित करने से न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचेगा, बल्कि स्थानीय लोगों का जीवन भी प्रभावित होगा।
ग्राम सभा में क्या हुआ
ग्राम सभा के दौरान पंचायत प्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बिना ग्राम सभा की सहमति के किसी भी प्रकार का भूमि अधिग्रहण स्वीकार नहीं किया जाएगा। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि टाउनशिप परियोजना को लेकर उन्हें पूरी जानकारी नहीं दी गई और न ही उनकी राय ली गई।
सभा में यह भी चर्चा हुई कि अगर भूमि अधिग्रहण हुआ तो:
• स्थानीय किसानों की जमीन चली जाएगी
• जल स्रोतों पर दबाव बढ़ेगा
• क्षेत्र का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ेगा
• भविष्य में भूस्खलन और जल संकट जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं
ग्रामीणों की मांग क्या है
ग्रामीणों की प्रमुख मांग है कि:
• टाउनशिप परियोजना को तुरंत रोका जाए
• किसी भी फैसले से पहले ग्राम सभा की लिखित सहमति ली जाए
• पर्यावरण प्रभाव आंकलन (EIA) को सार्वजनिक किया जाए
• स्थानीय लोगों के हितों को प्राथमिकता दी जाए
ग्रामीणों ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों को नजरअंदाज किया गया, तो वे आंदोलन और कानूनी रास्ता अपनाने से भी पीछे नहीं हटेंगे।
प्रशासन की भूमिका पर सवाल
इस पूरे मामले में प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। लोगों का कहना है कि विकास के नाम पर पहाड़ी क्षेत्रों में अंधाधुंध निर्माण भविष्य के लिए खतरा बन सकता है। इसलिए जरूरी है कि किसी भी परियोजना से पहले स्थानीय सहमति और पर्यावरण सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए।
बागी पंचायत में जठिया देवी टाउनशिप का विरोध यह दिखाता है कि आज ग्रामीण समाज अपने अधिकारों और पर्यावरण को लेकर पहले से कहीं ज्यादा जागरूक है। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है, ताकि आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य मिल सके।
