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यूरोप की नींद उड़ाने वाला फैसला , रूस ने सैन्य समझौतों से किया किनारा , अब यूरोप के साथ नहीं मानेगा पुराने नियम

यूरोप की सुरक्षा दीवार में दरार रूस के समझौते तोड़ने का असली संदेश क्या है

जब कोई देश किसी सैन्य समझौते से बाहर निकलता है, तो वह सिर्फ काग़ज़ी दस्तख़त नहीं हटाता—वह आने वाले टकराव की दिशा भी तय करता है। रूस द्वारा यूरोपीय देशों के साथ किए गए कई सैन्य समझौतों से खुद को अलग करना, उसी तरह का एक रणनीतिक संकेत है, जिसे दुनिया अब धीरे-धीरे समझ रही है।

अक्सर लोग मानते हैं कि सैन्य समझौते केवल मिसाइलों या टैंकों की गिनती से जुड़े होते हैं। जबकि हकीकत में ये समझौते
आपसी भरोसे
अचानक सैन्य हमलों की रोकथाम
और सीमाओं पर शांति बनाए रखने
का आधार होते हैं।

रूस का इनसे हटना दरअसल यह कहता है कि अब वह यूरोप के साथ भरोसे की राजनीति समाप्त मान चुका है। रूस क्यों बदल रहा है अपना खेल , यूक्रेन युद्ध के बाद रूस ने महसूस किया कि यूरोपीय देश अब , मध्यस्थ नहीं , बल्कि विरोधी गुट का हिस्स बन चुके हैं। नाटो की सैन्य गतिविधियों, हथियार सप्लाई और पूर्वी यूरोप में बढ़ती मौजूदगी को रूस सीधी चुनौती मानता है। ऐसे में समझौते उसके लिए सुरक्षा नहीं, बल्कि रणनीतिक बाधा बन गए।

यूरोप की सबसे बड़ी चिंता क्या है

यूरोप की परेशानी सिर्फ यह नहीं कि समझौते टूटे हैं, बल्कि यह है कि अब कोई स्पष्ट नियम नहीं बचा। जब निरीक्षण, सूचना साझा करना और सीमित हथियार तैनाती जैसी व्यवस्थाएँ खत्म होती हैं, तब
गलत अनुमान
अचानक सैन्य प्रतिक्रिया
और अनियोजित संघर्ष
का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

स्थिति शीत युद्ध जैसी ज़रूर लगती है, लेकिन फर्क बड़ा है। पहले मुकाबला दो महाशक्तियों के बीच था, अब . कई देश , कई मोर्चे , और तेज़ टेक्नोलॉजी
शामिल हैं। इसलिए यह टकराव ज्यादा तेज़ और कम नियंत्रित हो सकता है।रूस और यूरोप के बीच यह दूरी सिर्फ क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है। इसका असर , वैश्विक हथियार संतुल , ऊर्जा सुरक्षा , और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति , पर भी पड़ेगा। यूरोप के लिए यह चेतावनी है, और दुनिया के लिए एक संकेत कि आने वाला दौर कूटनीति से ज़्यादा रणनीति का होगा।

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