बीमा पर विदेशी कब्ज़ा? 100% FDI के खिलाफ सड़कों पर उतरे LIC कर्मचारी , क्या खतरे में है आपकी पॉलिसी

बीमा का भविष्य दांव पर? 100% FDI के फैसले के खिलाफ क्यों सड़कों पर उतरे LIC कर्मचारी
देश की सबसे भरोसेमंद और पुरानी वित्तीय संस्थाओं में से एक भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ सवाल सिर्फ कर्मचारियों के अधिकारों का नहीं, बल्कि भारत की सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के भविष्य का भी है। केंद्र सरकार द्वारा बीमा क्षेत्र में 100% विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) की अनुमति दिए जाने के फैसले ने LIC कर्मचारियों को आंदोलन के लिए मजबूर कर दिया है।
FDI का फैसला कागज़ पर सुधार ज़मीन पर डर
सरकार का तर्क है कि 100% FDI से , बीमा सेक्टर में पूंजी बढ़ेगी , प्रतिस्पर्धा आएगी , और सेवाओं में सुधार होगा लेकिन LIC कर्मचारी इसे केवल आर्थिक सुधार नहीं, बल्कि धीमी गति से हो रहे निजीकरण की शुरुआत मान रहे हैं। उनका कहना है कि जब विदेशी कंपनियों को पूरा नियंत्रण मिलेगा, तो बीमा सिर्फ मुनाफे का साधन बन जाएगा, न कि सामाजिक सुरक्षा का।
LIC सिर्फ कंपनी नहीं, भरोसे की संस्था
LIC कोई आम बीमा कंपनी नहीं है। यह ग्रामीण भारत में बीमा की रीढ़ मध्यम वर्ग की बचत का सहारा और सरकार की कई कल्याणकारी योजनाओं का आधार रही है।कर्मचारियों का मानना है कि विदेशी कंपनियों की प्राथमिकता मुनाफा होगी,
जबकि LIC की प्राथमिकता अब तक सुरक्षा और स्थिरता रही है।100% FDI का मुद्दा केवल निवेश का नहीं, बल्कि देश की बीमा आत्मा का सवाल है।
LIC कर्मचारियों का विरोध यह याद दिलाता है कि . हर आर्थिक फैसला सिर्फ आंकड़ों से नहीं, बल्कि लोगों के भरोसे से भी तौला जाना चाहिए।
आंदोलन के पीछे असली चिंता क्या है
LIC यूनियनों का विरोध सिर्फ नौकरी बचाने तक सीमित नहीं है। उनकी प्रमुख चिंताएँ हैं:
भविष्य में सरकारी नियंत्रण कमजोर होना
पॉलिसीधारकों के हितों से समझौता
कर्मचारियों की सेवा शर्तों पर असर
ग्रामीण और गरीब तबके की उपेक्षा
उनका सवाल साफ है , अगर बीमा पूरी तरह विदेशी कंपनियों के हाथ में चला गया, तो सामाजिक जिम्मेदारी कौन निभाएगा . सरकार इसे आर्थिक उदारीकरण की दिशा में जरूरी कदम बता रही है, जबकि कर्मचारी इसे
राष्ट्रीय संपत्ति को जोखिम में डालने वाला फैसला मान रहे हैं।इस फैसले का असर केवल LIC कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहेगा। अगर बीमा सेक्टर पूरी तरह कॉर्पोरेट नियंत्रण में गया, तो . प्रीमियम महंगे हो सकते हैं
क्लेम प्रक्रिया सख्त हो सकती है , और छोटे निवेशकों की अहमियत घट सकती है \ यानी असर सीधे आम आदमी की जेब और सुरक्षा पर पड़ेगा।
