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अब बुज़ुर्ग नहीं रहेंगे मजबूर, 50% पेंशन लागू , रिटायरमेंट के बाद भी मिलेगी बड़ी राहत, फैसला सबको चौंकाएगा

भारत में पेंशन को लंबे समय तक सिर्फ़ एक सरकारी सुविधा माना गया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने इस सोच को पूरी तरह बदल दिया है। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि ओल्ड एज पेंशन कोई दया या अनुग्रह नहीं, बल्कि व्यक्ति के सम्मानजनक जीवन का अधिकार है। इसी सोच के साथ अब प्राणी पेंशन शब्द चर्चा में आया है, जो पेंशन को एक जीवित इंसान की बुनियादी ज़रूरत से जोड़ता है।

सुप्रीम कोर्ट ने बुढ़ापा ओल्ड एज पेंशन को 50% देने का की फैसला किया

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, जो व्यक्ति अपना पूरा जीवन देश, समाज या संस्था की सेवा में लगा देता है, उसे बुढ़ापे में असुरक्षित नहीं छोड़ा जा सकता। अदालत ने यह माना कि रिटायरमेंट के बाद भी इंसान की ज़रूरतें खत्म नहीं होतीं। इलाज, दवाइयाँ, भोजन, मकान और आत्मसम्मान — ये सब खर्च बुढ़ापे में और बढ़ जाते हैं। ऐसे में पेंशन को बहुत कम राशि तक सीमित करना जीवन के अधिकार का उल्लंघन माना जा सकता है।

इस फैसले का सबसे अहम पहलू 50% ओल्ड एज पेंशन का सिद्धांत है। कोर्ट ने संकेत दिया कि रिटायरमेंट के बाद व्यक्ति को उसके आख़िरी वेतन या तय मानक का कम से कम 50 प्रतिशत पेंशन के रूप में मिलना चाहिए, ताकि वह दूसरों पर निर्भर हुए बिना सम्मानजनक जीवन जी सके। यह फैसला पेंशन व्यवस्था को मानवीय दृष्टिकोण से देखने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।

आम नागरिकों के लिए यह निर्णय बहुत मायने रखता है। बुज़ुर्गों को इससे आर्थिक सुरक्षा और आत्मसम्मान मिलेगा। परिवारों पर वित्तीय दबाव कम होगा और नौकरीपेशा लोगों को अपने भविष्य को लेकर भरोसा मिलेगा कि रिटायरमेंट के बाद वे असहाय नहीं होंगे।

सरकारों के लिए यह फैसला एक स्पष्ट संदेश है कि सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में समझौता नहीं किया जा सकता। पेंशन को लेकर मनमानी, देरी या कटौती अब कानूनी जांच के दायरे में आएगी। एक वेलफेयर स्टेट वही होता है, जो अपने बुज़ुर्ग नागरिकों को सुरक्षित और सम्मानित जीवन दे।

अंत में, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सिर्फ़ पेंशन बढ़ाने का आदेश नहीं है, बल्कि यह बुढ़ापे को सम्मान देने की नई सोच है।

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